परिसीमन : भारतीय लोकतंत्र में समान प्रतिनिधित्व का आधार

(सामान्य अध्ययन – द्वितीय प्रश्नपत्र | भारतीय राजव्यवस्था एवं शासन)

प्रस्तावना


भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र की सफलता तभी संभव है जब प्रत्येक नागरिक को समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्राप्त हो। समय के साथ जनसंख्या में परिवर्तन होता है, जिसके कारण निर्वाचन क्षेत्रों की जनसंख्या में भी असमानता आ जाती है। इस असमानता को दूर करने के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं तथा सीटों का पुनर्निर्धारण किया जाता है, जिसे परिसीमन कहा जाता है।
हाल ही में परिसीमन का विषय पुनः चर्चा में आया है क्योंकि केंद्र सरकार द्वारा संभावित परिसीमन प्रक्रिया पर विचार किया जा रहा है तथा द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) ने इसके संबंध में कुछ शर्तें रखी हैं।

परिसीमन क्या है?


परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत


• लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण किया जाता है।


• प्रत्येक राज्य को मिलने वाली लोकसभा सीटों की संख्या निर्धारित की जाती है।


• अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण किया जाता है।


• इसका उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को लगभग समान प्रतिनिधित्व प्रदान करना है।

परिसीमन आयोग


• भारत में परिसीमन का कार्य परिसीमन आयोग द्वारा किया जाता है।


• इसका गठन संसद द्वारा बनाए गए अधिनियम के अंतर्गत किया जाता है।


• इसके निर्णय अंतिम माने जाते हैं।


• सामान्यतः इसके निर्णयों को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।

भारत में परिसीमन का इतिहास


भारत में परिसीमन आयोग का गठन चार बार किया गया है—
1952
1963
1973
2002


प्रथम परिसीमन 1950-51 में राष्ट्रपति द्वारा निर्वाचन आयोग की सहायता से कराया गया था।

वर्तमान विवाद


द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) का मत है कि यदि नई जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण किया गया, तो जनसंख्या नियंत्रण में सफल दक्षिण भारतीय राज्यों को राजनीतिक नुकसान होगा।


इसी कारण दल ने तीन प्रमुख माँगें रखी हैं—


• 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों का स्थगन 25 वर्ष और बढ़ाया जाए।


• सभी राज्यों की लोकसभा सीटों में 50 प्रतिशत समान वृद्धि की जाए।


• प्रत्येक राज्य को मिलने वाली सीटों की संख्या पहले से स्पष्ट की जाए।

संवैधानिक पृष्ठभूमि


42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976


• 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों को स्थिर कर दिया गया।


84वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2001


• निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण की अनुमति दी गई।


87वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2003


• 2001 की जनगणना के आधार पर परिसीमन की अनुमति दी गई, किंतु राज्यों की कुल सीटों में परिवर्तन नहीं किया गया।


परिसीमन का महत्व


• लोकतंत्र में समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है।


• प्रत्येक मत के मूल्य को संतुलित बनाता है।


• अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति को उचित प्रतिनिधित्व देता है।


• बदलती जनसंख्या के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन करता है।


• लोकतांत्रिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाता है।

प्रमुख चुनौतियाँ


• उत्तर एवं दक्षिण भारत के बीच प्रतिनिधित्व का असंतुलन।


• जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों की चिंता।


• संघीय ढाँचे पर संभावित प्रभाव।


• राजनीतिक विवाद एवं क्षेत्रीय असंतोष।

प्रारंभिक परीक्षा (UPSC शैली) वस्तुनिष्ठ प्रश्न


प्रश्न: परिसीमन आयोग के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए—


1. इसका गठन संसद द्वारा बनाए गए अधिनियम के अंतर्गत किया जाता है।


2. यह लोकसभा एवं विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ निर्धारित करता है।


3. यह अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण भी करता है।


उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?


(क) केवल 1
(ख) केवल 1 और 2
(ग) केवल 2 और 3
(घ) 1, 2 और 3 ✔️

संघ लोक सेवा आयोग (मुख्य परीक्षा) का प्रश्न


वर्ष 2012 | सामान्य अध्ययन – द्वितीय प्रश्नपत्र


“भारत में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने में परिसीमन आयोग की भूमिका का परीक्षण कीजिए।”
(10 अंक)

अभ्यास हेतु मुख्य परीक्षा प्रश्न


प्रश्न (15 अंक | 250 शब्द)


“प्रस्तावित परिसीमन भारत के संघीय ढाँचे तथा राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को पुनर्परिभाषित कर सकता है।” इस कथन के आलोक में परिसीमन के संवैधानिक आधार, उससे जुड़ी चुनौतियों तथा संतुलित समाधान का विवेचन कीजिए।

निष्कर्ष


परिसीमन केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक समानता, सामाजिक न्याय, संघवाद तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रक्रिया है। आगामी जनगणना एवं संभावित परिसीमन के कारण यह विषय संघ लोक सेवा आयोग की प्रारंभिक तथा मुख्य परीक्षा—दोनों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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