23 सितंबर 2026 करेंट अफेयर्स
यूपीएससी, पीसीएस एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए 6 महत्वपूर्ण विषय
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तथ्य • पृष्ठभूमि • विश्लेषण • प्रारंभिक परीक्षा • मुख्य परीक्षा
1. वंदे मातरम् और व्यक्तिगत स्वतंत्रता: सर्वोच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण अवलोकन
क्या हुआ?
वंदे मातरम् के गायन को लेकर चल रही संवैधानिक बहस में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार राष्ट्रीय गीत के स्वरूप और उसके आधिकारिक उपयोग की व्यवस्था कर सकती है, लेकिन किसी व्यक्ति को धार्मिक आस्था या अंतरात्मा के आधार पर इसे गाने से इनकार करने के कारण दंडित नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने इस प्रश्न की जांच पर सहमति जताई कि वंदे मातरम् न गाने पर आपराधिक दंड का प्रावधान संवैधानिक रूप से टिक सकता है या नहीं।
पृष्ठभूमि
- स्रोत सामग्री के अनुसार वंदे मातरम् की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने संस्कृतनिष्ठ बांग्ला में की थी और इसे पहली बार 7 नवंबर 1875 को प्रकाशित किया गया था।
- 1896 के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे गाया था।
- 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने इसके पहले दो अंतरों को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया था।
- 24 जनवरी 1950 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम् को राष्ट्रगान के समान सम्मान दिए जाने की बात कही थी।
- भारतीय संविधान राष्ट्रीय गीत को अलग से परिभाषित नहीं करता; अनुच्छेद 51(क)(क) राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान से संबंधित मूल कर्तव्य बताता है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने 1986 के बिजो एमैनुएल बनाम केरल राज्य निर्णय के सिद्धांतों की ओर भी ध्यान दिलाया, जिसमें अंतरात्मा और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा की गई थी।
परीक्षा दृष्टिकोण
यह विषय मौलिक अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता, मूल कर्तव्य और राष्ट्रीय प्रतीकों के संवैधानिक दर्जे से जुड़ा है।
वंदे मातरम् से संबंधित निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
(क) संविधान में इसे स्पष्ट रूप से राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया है।
(ख) अनुच्छेद 51(क)(क) नागरिकों को राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करने का मूल कर्तव्य देता है।
(ग) इसे 1950 में संविधान की प्रस्तावना में शामिल किया गया था।
(घ) इसका पहला प्रकाशन 1947 में हुआ था।
राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान और व्यक्ति की अंतरात्मा एवं धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संवैधानिक संतुलन की चर्चा कीजिए।
2. ‘नोमैडिक एलीफेंट 2026’: भारत–मंगोलिया सैन्य सहयोग
क्या हुआ?
भारत और मंगोलिया के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास नोमैडिक एलीफेंट 2026 का 18वाँ संस्करण उत्तराखंड के पिथौरागढ़ स्थित फॉरेन ट्रेनिंग नोड में शुरू हुआ। अभ्यास 21 सितंबर से 3 अक्टूबर 2026 तक चल रहा है। भारतीय सेना और मंगोलियाई सशस्त्र बलों के 45-45 सैन्यकर्मी इसमें भाग ले रहे हैं।
मुख्य तथ्य
- यह वार्षिक प्लाटून-स्तरीय द्विपक्षीय सैन्य अभ्यास है और भारत तथा मंगोलिया में बारी-बारी से आयोजित किया जाता है।
- 2026 इसका 18वाँ संस्करण है; पिछला संस्करण 2025 में उलानबटार में हुआ था।
- प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र के अधिदेश के अंतर्गत अर्ध-शहरी और पर्वतीय क्षेत्रों में आतंकवाद-रोधी अभियानों की संयुक्त क्षमता बढ़ाना है।
- कॉर्डन एवं तलाशी, कक्ष हस्तक्षेप, विशेष हेलिबोर्न अभियान, साइबर सुरक्षा, ड्रोन और प्रति-ड्रोन प्रणालियों पर प्रशिक्षण शामिल है।
भारत के लिए महत्व
यह अभ्यास सैन्य अंतरसंचालनीयता, पर्वतीय युद्ध प्रशिक्षण, आतंकवाद-रोधी क्षमता और भारत–मंगोलिया रक्षा संबंधों को मजबूत करने के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।
‘नोमैडिक एलीफेंट’ सैन्य अभ्यास किन देशों के बीच आयोजित होता है?
(क) भारत–कजाखस्तान
(ख) भारत–मंगोलिया
(ग) भारत–उज़्बेकिस्तान
(घ) भारत–वियतनाम
भारत–मंगोलिया रक्षा सहयोग के सामरिक महत्व का परीक्षण कीजिए।
3. खुले बाजार परिचालन: आरबीआई द्वारा तरलता प्रबंधन
क्या हुआ?
भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकिंग प्रणाली में मौजूद टिकाऊ अतिरिक्त रुपया तरलता को कम करने के लिए सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री के माध्यम से खुले बाजार परिचालन किया। उपलब्ध स्रोत सामग्री में ₹25,000 करोड़ मूल्य की सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री का उल्लेख है।
खुले बाजार परिचालन क्या है?
- आरबीआई द्वारा खुले बाजार में सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद-बिक्री को खुले बाजार परिचालन कहा जाता है।
- आरबीआई सरकारी प्रतिभूतियाँ खरीदता है तो बैंकिंग प्रणाली में आरक्षित धन और मुद्रा आपूर्ति बढ़ती है।
- आरबीआई सरकारी प्रतिभूतियाँ बेचता है तो बैंकिंग प्रणाली से तरलता बाहर जाती है और मुद्रा आपूर्ति घटती है।
- यह आरबीआई का एक मात्रात्मक मौद्रिक नीति उपकरण है, जिसका उपयोग तरलता, ब्याज दरों और मुद्रास्फीति की परिस्थितियों को प्रभावित करने के लिए किया जाता है।
- ऑपरेशन ट्विस्ट में लंबी अवधि की सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद और छोटी अवधि की प्रतिभूतियों की बिक्री जैसी विपरीत दिशा की कार्रवाई शामिल होती है।
समसामयिक संदर्भ में आरबीआई की तरलता प्रबंधन कार्रवाई पर बाजार रिपोर्टों ने भी ध्यान दिया है; सितंबर के दौरान बैंकिंग प्रणाली की अतिरिक्त तरलता को कम करने के लिए ओएमओ और अन्य उपकरणों का उपयोग किया गया है।
आरबीआई द्वारा सरकारी प्रतिभूतियों की खुले बाजार में बिक्री का सामान्य प्रभाव क्या होता है?
(क) बैंकिंग प्रणाली की तरलता बढ़ती है
(ख) बैंकिंग प्रणाली की तरलता घटती है
(ग) मुद्रा आपूर्ति हमेशा दोगुनी हो जाती है
(घ) राजकोषीय घाटा स्वतः समाप्त हो जाता है
मौद्रिक नीति के मात्रात्मक उपकरण के रूप में खुले बाजार परिचालन की भूमिका समझाइए।
4. पंजाब का भूजल संकट: कृषि नीति और असमानता का प्रश्न
क्या हुआ?
पंजाब में भूजल का अत्यधिक दोहन एक गंभीर पर्यावरणीय और कृषि-आर्थिक चुनौती बना हुआ है। 2025–26 के गतिशील भूजल आकलन के अनुसार राज्य में भूजल दोहन का चरण 152% रहा। राज्य के 153 आकलन खंडों में लगभग 72% ‘लाल क्षेत्र’ में हैं।
मुख्य आँकड़े
- भूजल दोहन दर: 152%।
- 153 में से लगभग 72% आकलन खंड लाल क्षेत्र में।
- चावल और गेहूँ की सिंचाई भूजल की सबसे बड़ी उपभोक्ता है और नवीनतम अनुमान में लगभग 25 अरब घन मीटर पानी प्रतिवर्ष उपयोग होता है।
- 2022 से 2025 के बीच मानसून बाद 40 मीटर से अधिक गहराई पर जलस्तर वाले प्रेक्षण कुओं की हिस्सेदारी में दो प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई।
- सिंचाई के लिए चावल–गेहूँ प्रणाली को सुनिश्चित खरीद, सब्सिडी वाली बिजली और भूजल की उपलब्धता ने लंबे समय तक प्रोत्साहित किया है।
सामाजिक-आर्थिक आयाम
स्रोत में रेखांकित किया गया है कि गहराते जलस्तर का प्रभाव सभी किसानों पर समान नहीं पड़ता। गहरे नलकूपों में निवेश करने की क्षमता रखने वाले बड़े किसान अधिक पानी तक पहुँच बना सकते हैं, जबकि छोटे किसान पानी खरीदने पर निर्भर हो सकते हैं। इससे जल संकट के साथ ग्रामीण संपत्ति-असमानता भी बढ़ सकती है।
पंजाब में भूजल संकट के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-से कारक महत्वपूर्ण हैं?
1. चावल–गेहूँ फसल प्रतिरूप
2. सुनिश्चित सरकारी खरीद
3. सब्सिडी वाली बिजली
4. सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भरता
(क) केवल 1 और 2
(ख) केवल 2 और 3
(ग) केवल 1, 3 और 4
(घ) 1, 2, 3 और 4
“भारतीय कृषि में भूजल का असतत दोहन केवल जल-अभाव का परिणाम नहीं, बल्कि विकृत फसल प्रतिरूपों और नीतिगत प्रोत्साहनों का भी परिणाम है।” चर्चा कीजिए।
5. हाइफ़ा का युद्ध: इतिहास, भारतीय सैनिक और स्मृति की राजनीति
क्या हुआ?
23 सितंबर 1918 का हाइफ़ा युद्ध प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सैनिकों की भूमिका और भारत–इज़राइल संबंधों की ऐतिहासिक स्मृति से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रसंग है। स्रोत सामग्री के अनुसार एक लाख से अधिक भारतीय सैनिकों ने विदेशों में प्रथम विश्व युद्ध में सेवा की और 74,000 से अधिक भारतीय सैनिक मारे गए।
ऐतिहासिक महत्व
- भारतीय घुड़सवार सैनिकों की जीत ने उस समय फिलिस्तीन में ब्रिटिश नियंत्रण को मजबूत करने में भूमिका निभाई।
- भारत में हाइफ़ा को भारतीय सैनिकों की वैश्विक सैन्य भूमिका के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
- इज़राइल में भी भारतीय सैनिकों की भूमिका की स्मृति को भारत–इज़राइल मैत्री के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
- स्रोत यह भी रेखांकित करता है कि भारतीय सैनिक औपनिवेशिक कमान के अधीन लड़ रहे थे और युद्ध के व्यापक राजनीतिक परिणाम उनके नियंत्रण में नहीं थे।
यूपीएससी दृष्टिकोण
यह विषय प्रथम विश्व युद्ध, औपनिवेशिक भारत, भारतीय सैनिकों की वैश्विक भूमिका, पश्चिम एशिया के इतिहास तथा भारत–इज़राइल संबंधों को जोड़ता है।
हाइफ़ा का युद्ध किस वर्ष लड़ा गया था?
(क) 1914
(ख) 1916
(ग) 1918
(घ) 1920
प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सैनिकों की भूमिका ने औपनिवेशिक भारत को वैश्विक इतिहास से किस प्रकार जोड़ा? हाइफ़ा के उदाहरण सहित समझाइए।
6. भारत में नागरिक अवसंरचना का संकट और शासन की जवाबदेही
विषय क्या है?
स्रोत सामग्री ने भारत में नागरिक अवसंरचना के विफल होने से होने वाली दुर्घटनाओं को शासन, नियमन और अनुपालन की व्यापक समस्या से जोड़ा है। खराब शहरी नियोजन, नियमों का कमजोर प्रवर्तन और सार्वजनिक अनुपालन संबंधी जानकारी की कमी इस समस्या के महत्वपूर्ण पहलू हैं।
मुख्य बिंदु
- भवनों और सार्वजनिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए निर्धारित मानकों का नियमित अनुपालन परीक्षण आवश्यक है।
- स्रोत ने सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित अनुपालन प्रमाणपत्रों और उल्लंघनों के सार्वजनिक अभिलेख की आवश्यकता पर जोर दिया है।
- नागरिकों को किसी प्रतिष्ठान की सुरक्षा और अनुपालन स्थिति की जानकारी उपलब्ध होने से सूचित निर्णय लेने में मदद मिल सकती है।
- कोविड-19 के दौरान लागू किए गए कड़े परिचालन दिशानिर्देशों और उनके प्रवर्तन को नागरिक अवसंरचना की सुरक्षा के संदर्भ में उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
शासन से संबंध
यह विषय शहरी शासन, नियामक संस्थाओं की जवाबदेही, भवन सुरक्षा, आपदा जोखिम न्यूनीकरण, नागरिक जागरूकता और कानून के प्रभावी प्रवर्तन को जोड़ता है।
निम्नलिखित में से कौन-सा नागरिक अवसंरचना की सुरक्षा के लिए प्रभावी शासन का प्रमुख तत्व है?
(क) केवल दुर्घटना के बाद कार्रवाई
(ख) नियमित अनुपालन निरीक्षण और नियमों का प्रभावी प्रवर्तन
(ग) केवल निजी क्षेत्र पर निर्भरता
(घ) सुरक्षा प्रमाणपत्रों को सार्वजनिक न करना
भारत में नागरिक अवसंरचना की विफलताओं को रोकने के लिए नियमन, शहरी नियोजन, पारदर्शिता और नागरिक भागीदारी को मजबूत करने के उपाय सुझाइए।
इस पोस्ट का आधार 23 सितंबर 2026 की उपलब्ध अध्ययन-सामग्री है। विषयों की तथ्य-जाँच और अतिरिक्त संदर्भ के लिए समकालीन रिपोर्टों तथा आधिकारिक/विश्वसनीय स्रोतों का उपयोग किया गया है, जिनमें सर्वोच्च न्यायालय से संबंधित रिपोर्ट, रक्षा मंत्रालय/पीआईबी आधारित नोमैडिक एलीफेंट विवरण तथा केंद्रीय भूजल बोर्ड से संबंधित सामग्री शामिल है।
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23 सितंबर 2026 | यूपीएससी • पीसीएस • यूपीपीसीएस

